दिव्य योजना की पाती से (#8691)

*(पर्वत, मरुभूमि, समतल, अथवा समुद्र की राह जो कोई भी शिक्षण के उद्देश्य से भ्रमण कर रहा हो, उसे यह प्रार्थना करनी चाहिये।)
 
हे ईश्वर! हे मेरे ईश्वर! तू मेरी दुर्बलता, दीनता और विनम्रता को देखता है, फिर भी तेरी शक्ति और सामर्थ्‍य में भरोसा रखते हुए, मैंने तुझमें विश्वास किया है और तेरे सेवकों के मध्य तेरी शिक्षाओं के प्रसार के लिये मैं उठ खड़ा हुआ हूँ। 
हे स्वामी, मैं एक पंख टूटा पक्षी हूँ और तेरे असीम अंतरिक्ष में उड़ान भरना चाहता हूँ। तेरी अनुकम्पा और कृपा, तेरी सम्पुष्टि और सहायता के बिना मेरे लिये ऐसा करना भला कैसे सम्भव होगा?
हे ईश्वर! मेरी दुर्बलता पर दया कर और अपनी सामर्थ्‍य की शक्ति मुझे दान दे। हे स्वामिन्! यदि पावन चेतना के उच्छ्वास सर्वाधिक निर्बल प्राणियों को भी सम्पुष्टि प्रदान कर दें तो वह जो भी चाहेगा प्राप्त कर लेगा, जो भी कामना करेगा उसे पा लेगा। निश्चय ही तूने पहले भी अपने सेवकों की सहायता की है। वे दुर्बलतम् प्राणी थे, तेरे अकिंचन सेवक और धरती पर निवास करने वालों में निरीहतम थे, लेकिन तेरी कृपा और शक्ति के द्वारा उन्होंने उनसे भी ऊँचा स्थान पा लिया, जो मानवजाति के बीच अत्यन्त प्रतापशाली और प्रतिष्ठित माने जाते थे। वे पहले पतंगे समान थे, शाही बाज बन गये, वे पतली जलधारा के समान थे, बन गये समुद्र से विशाल, क्योंकि तेरी कृपा के सहारे ही वे मार्गदर्शन के क्षितिज के जगमगाते सितारे बन गये, अमरता की गुलाब वाटिका के चहकते पंछी बन गये, ज्ञान और विवेक के जंगलों के दहाड़ते सिंह बन गये और महासागरों में तैरते महामत्स्य बन गये।
निश्चय ही तू करुणामय, शक्तिसम्पन्न, सार्मथ्यशाली और दयालुओं में सर्वाधिक दयालु है।

-`Abdu'l-Bahá
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दिव्य योजना की पाती से (#8690)

हे तू अतुलनीय ईश्वर! हे तू साम्राज्य के स्वामी! ये आत्माएँ तेरी दिव्य सेना हैं। इनकी सहायता कर और सर्वोच्च देवदूतों द्वारा उन्हें विजयी बना, ताकि उनमें से प्रत्येक एक सैन्य दल के समान बन जाये और ईश्वर के प्रेम और दिव्य शिक्षाओं की ज्योति द्वारा इन देशों पर विजय प्राप्त  करे। 
हे ईश्वर! तू उनका समर्थक और सहायक बन, और बीहड़ में, पर्वत पर, घाटी में, वनों में, घास के मैदानों को और समुद्रों में तू उनका विश्वासपात्र बन-ताकि वे दिव्य साम्राज्य की शक्ति और पावन चेतना की श्वांस द्वारा ऊँची पुकार लगा सकें। 
सत्य ही, तू शक्तिशाली, सामर्थ्‍यवान और सर्वशक्तिमान है, और तू ही प्रज्ञावंत, सुनने वाला और देखने वाला है।

-`Abdu'l-Bahá
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दिव्य योजना की पाती से (#8689)

हे ईश्वर, मेरे ईश्वर! गुणगान हो तेरा, शत-शत नमन तुझे। तूने ही दिखलाई है राह मुझे उस राजमार्ग की जो सीधा है, किन्तु है बहुत लम्बा पथ; तूने ही इस पथ पर चलने के योग्य बनाया है, मेरी आँखों को नवीन प्रकाश दिया है अपनी आभा का, तूने ही रहस्यों के साम्राज्य से आने वाले पावन पक्षियों के कलरव को सुनने वाले कान दिये हैं और तूने ही न्यायनिष्ठों के मध्य अपने प्रेम से विभोर किया है। हे ईश्वर! अपनी चेतना के उच्छ्वासों से मेरा रोम-रोम को भर दे कि मैं देश-देशान्तर में सम्पूर्ण मानवजाति को तेरे आगमन का शुभ संदेश दे सकूँ, पृथ्वी पर तेरे साम्राज्य की स्थापना की बात बता सकूँ। हे ईश्वर, मैं निर्बल हूँ, अपनी शक्ति और सामर्थ्‍य से मुझे सबल बना। मैं अक्षम हूँ, अपनी स्तुति और गुणगान करने में मुझे सक्षम बना। मैं अधम हूँ, अपने साम्राज्य में प्रवेश देकर मुझे सम्मानित कर; मैं तुझसे अलग-थलग पड़ गया हूँ, अपनी दयालुता की पावन देहरी तक पहुँचने में मेरी सहायता कर। हे ईश्वर! मुझे एक देदीप्यमान दीपक बना दे, एक जगमगाता हुआ सितारा बना दे, फलों से भरा एक ऐसा वृक्ष बना दे जिसकी शाखाएँ फैलें। सत्य ही, तू शक्तिशाली, बलशाली, और अबाधित है।

-`Abdu'l-Bahá
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दिव्य योजना की पाती से (#8688)

हे ईश्वर! मेरे ईश्वर! यह एक पंख टूटा पंछी है और इसकी उड़ान बहुत धीमी है....इसकी सहायता कर कि यह समृद्धि और मुक्ति के सर्वोच्च शिखर पर उड़ान भर सके, इस असीम अंतरिक्ष में परम आनन्द और सुख सहित सर्वत्र विचरण कर सके, सभी देशों-प्रदेशों में तेरे सर्वोपरि नाम का मधुरगान गुंजरित कर सके, तेरी पुकार सुन सके और तेरे मार्गदर्शन के संकेतों को समझ सके। हे ईश्वर, मैं अकेला, एकाकी और दीन हूँ। तेरे अतिरिक्त मेरा कोई पालनहार नहीं, अवलम्बन नहीं; तेरे अतिरिक्त कोई और सहारा नहीं है। देवदूतों के समूहों द्वारा मेरी सहायता कर; अपने शब्दों के प्रसार में मुझे विजयी बना और अपने लोगों के बीच तेरे ज्ञान का प्रसार कर सकूँ, मुझे इस योग्य बना। सत्य ही, तू निर्बल का बल; और असहायों का सदा सहाय है। सत्य ही तू शक्तिशाली, बलशाली और अबाधित है।

-`Abdu'l-Bahá
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दिव्य योजना की पाती से (#8687)

*(ईश्वर की सुरभि का प्रसार करने वालों को प्रत्येक सुबह इस प्रार्थना का पाठ करना चाहिये।)
 
हे ईश्वर! मेरे ईश्वर! तू देखता है इस निर्बल को, तेरी दिव्य शक्ति की याचना करते हुए, इस निर्धन को, तेरी दैवी निधियों की कामना करते हुए इस प्यासे को, अनन्त जीवन-निर्झरनी की इच्छा लिये हुए इस पीड़ित को, उस आरोग्य की अभ्यर्थना करते हुए, जो तूने अपनी असीम कृपा के द्वारा अपने उच्च साम्राज्य में अपने चुने हुए जनों के लिये नियत की है। हे ईश्वर, तेरे अतिरिक्त मेरा कोई सहायक नहीं, तेरे अतिरिक्त मेरा कोई आश्रय नहीं, तेरे अतिरिक्त मेरा कोई पालनहार नहीं। अपने देवदूतों द्वारा मेरी सहायता कर कि मैं तेरी पावन सुरभि को सर्वत्र फैला सकूँ और देश-देशांतर में तेरे चुने हुए जनों के बीच तेरी शिक्षाओं का प्रसार कर सकूँ। हे मेरे ईश्वर! मुझे अपने सिवा अन्य सबसे अनासक्त होने की शक्ति दे, तेरी कृपा की डोर दृढ़ता से थामे रहूँ, ऐसी भक्ति दे, तेरे धर्म के प्रति पूरी तरह समर्पित रहूँ, ऐसी निष्ठा दे, तेरे प्रेम में समृद्ध और तूने अपने पावन ग्रंथ में जो भी निर्धारित किया है उसका पालन कर सकूँ, ऐसी दृढ़ता दे। सत्य ही, तू शक्तिशाली, सामर्थ्‍यवान और सर्वसम्पन्न है।

-`Abdu'l-Bahá
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